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तेरे बीमार की शायद विदा-ए-जान है तन से / 'ममनून' निज़ामुद्दीन

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तेरे बीमार की शायद विदा-ए-जान है तन से
जनाजे़ की वगरना वाँ है तैयारी का क्या बाइस

कहीं वक़्त-ए-ख़िताब ये यार अपने मुहँ से निकला था
लगा कहने कि मुझ में आप में यारी का क्या बाइस

मरीज़ अपने को देखा आह ख़ूँ आलूदा क्या क्या थे
न था गर दर्द दिल में नाला ओ ज़ारी का क्या बाइस

नहीं कुछ ज़ोर से लेता कोई दिल दो न दो ‘गगनूं’
ये मजबूरी का क्या मूजिब ये ना-चारी का क्या बाइस

मेरे सीने में गर आतिश-कदा पिन्हाँ नहीं ज़ालिम
फ़ुग़ान ओ आह से हर दम शरर-बारी का क्या बाइस

तसव्वुर चश्म-ए-ख़ूबाँ का मुक़र्रर तुम को रहता है
वगरना हज़रत-ए-दिल इतनी बीमारी का क्या बाइस

हुआ जब काम अपना काम दिल जब पूछने आए
मूझे ग़म खा चुका अब मेरी ग़म-ख़्वारी का क्या बाइस

अजब दीवानगी है कोई भी यूँ दिल फँसाता है
बहुत दाना थे ‘ममनूँ’ गिरफ़्तारी का क्या बाइस