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तैयार रह / असंगघोष

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तुम!
हमेशा चाहते रहे
हमारा दूल्हा
नहीं चढ़े
अपने विवाह में
घोड़ी पर
और रह आए
अपनी औकात में।

घोड़ी पर चढ़ना
तुम्हारा
जातिगत एकाधिकार रहा है
किन्तु घोड़े पर बाँधने वाली जीन
मेरे पुरखे ने ही बनाई
गाय के चमड़े से
जो तुम्हारी माँ थी,
इसके बिना
तुम कभी के
धूल-धूसरित हो चुके होते,
तुम्हारा
सदियों से
फरमान था
हमारी औरतें
नंगे पाँव ही
तुम्हारे घरों के सामने से
गुजरें हर बार
ताकि उनके पाँवों से
कोई धूल ना उड़े
तुम्हारी इज्जत पर।

तुमने विधान बनाया
कि चलते समय
लाठी ही ठोकते
रहना होगा मुझे
आवाज भी लगानी होगी
होकम,
महराज दूर रहो
ताकि मेरी छाया भी
तुम पर ना पड़े।

मेरे दूल्हे की बारात
चुप-चाप निकले
तुम्हारे मोहल्ले से
यदि ढाक भी बजे
तो तुम्हारे घरों के
निकल जाने के बाद बजे।
ऐसी ही अनेकानेक प्रतिबंधताएँ
सदियों से लादते रहे तुम
हमारे ऊपर,
अब हम कहते हैं
तुम अपना दूल्हा मत चढ़ाओ
घोड़ी पर
बैंड-बाजे मत बजाओ
हमारे घरों के सामने
हमारे ही गाँव में
जो हमारी जात से ही
जाना जाता है
तुम तैयार रहो सुनने
किसी भी दिन हमारा यह फरमान।