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तोडियें मत और इन टूटी ज़मीनों को / विनय कुमार

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तोडियें मत और इन टूटी ज़मीनों को।
रोकिए दीवार बनने से यक़ीनों को।

जानलेवा कम नहीं है यह महीना भी
याद करना छोङिए पिछले महीनों को।

धूप के पन्ने मशक्कत से निकलते हैं
दस्तखत करने न दें इन नामचीनों को।

किस नदी के खून से धोएँगे कहिए तो
इस नदी के खून से भींगी मशीनों को।

ताउफ़क़ है रेत की दुनिया यहाँ यारो
अब किसे बेचें बुजुगों के सफ़ीनों को।

शायरों को चांद की चटनी परोसेंगी
चांद कहना छोड़ देंगे तब हसीनों को।