भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए
लोक संगीत
कविता कोश विशेष क्यों है?
कविता कोश परिवार

तो हम रुकें / विजय वाते

Kavita Kosh से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

दिन कहे ही बात अब, जो तुम कहो तो हम रुकें।
इक नई बाराखड़ी, जो तुम गढ़ो तो हम रूकें।

दंश शब्दों के बहुत ही लिजलिजे से हो गए,
प्राण इनमें तुम अगर, जो कुछ भरो तो हम रुकें।

बुत मुकाबिल हो तो फिर ये धर्म रक्षा व्यर्थ है,
राम की, रावण की गाथा फिर गुनो तो हम रुकें।

अब तो उठती ही नहीं, है हूक भी इस दर्द की,
दर्द का जो दर्द है, वो तुम बुनो तो हम रुकें।

यूँ तो हो जाती हैं अक्सर आँखे नम और सुर्ख भी,
जो नज़र निस्तब्ध है, उसको पढ़ो तो हम रुकें।