भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए

तौर सिखाने होंगे / प्रेमलता त्रिपाठी

Kavita Kosh से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

सींच दिये घर उपवन हमने, जब फूल सयाने होंगे !
महके जिनसे जीवन अपना,नित तौर सिखाने होंगे ।

तिनके तिनके जोडे़ जिसमें,शीतल छाया पाना ग़र,
बहती धारा अनुकूल चलें,सब स्वप्न सुहाने होंगे ।
     ,
खोट निकाले माटी रूँधे,तभी निखरते जीवन घट,
नाच रहा यों समय चक्र है,नित चाक चलाने होंगे ।

पौध लगायी कूटनीति की, डाले अनगिन रोडे़ जो,
व्यर्थ कल्पना सुख की चाहत,परिणाम पुराने होंगे ।

पानी सिर से ऊपर है ये,प्रेम मर्म कथ्य न केवल,
संक्रमित यहाँ जन जीवन को,अब हमें बचाने होंगे ।