1.
उतरते हेमंत की सूखी हवाएँ
मन में पतझड़ के टूटे पत्ते
फड़फड़ाते हैं घायल पंछी के पर
2.
रात का शबनमी कंबल उतार
पहन रही है कली भोर की मुस्कुराहट
नियति की बीहड़ दिशाएँ सँवर रही हैं
3.
मुँह उठाकर जब-तब टीसतीं है
बड़े-बड़े दिनों की कटी हुई कतरनें
रिस रहा है समय मुझ में आरपार
4.
किस मजबूरी में खिलता है अशोक
नारी के बस इक पदाघात से
उत्तर मुस्कुराया है कामदेव के पांचवे बाण में
5.
गुबार से भरा है मन
रद्द हैं उड़ान खयालों की
यादें सेहरा से गुजर रही हैं
6.
ये तो अच्छा था कि गैर मिले
भला अपनों को कितना आज़मा ते हम
बेसबब मुक़द्दर को बदनाम कर दिया
7.
साँझ को उदास है गंगा-धार
नावों की है ये आखिरी कतार
दूर टिमटिमाते दियों में ज़िन्दगी पुकार रही है
8.
आँखों में समाया है स्वप्न कोई
कविता किसी कवि की पढ़ी जा रही है
कौन है जो गा रहा है मेरे प्रेम का गीत ?
9.
उम्र का कपोत बैठा है हथेली पर
सुलग रहा है हौले-हौले जिंदगी-वन
मुक्ति-दावानल तैयार है धधकने को
10.
सपने सिमटे हुए हैं इस सिरे पर
पहुँचकर ख़त्म होती है दौड़ वहाँ है तू
पुल बनकर बिछने को आतुर हुआ मन
11.
संग चली आयी है निब भर मिट्टी वतन की
नोक भर स्याही भी ले आये थे हम
यहीं रह जाएँगी अब किताबें अमर होकर
12.
खुद ही जिसे गढ़ता है मूर्तिकार
मिटाता नहीं निर्दयता से अपनी कृति को
फिर मेरा क्या कसूर था माँ?
13.
हवा चली एक फूल झरा बेला से
हवा चली एक बूंद गिरी मेघा से
यक्ष यक्षिणी का मन अटका मेघदूत में
14.
सूरदास कहाँ है तुम्हारा वृंदावन
कहाँ हैं वन, वीथियाँ, तमाल ,ताल
शरद की चाँदनी सँग महारास