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थोड़ी वज़ाहतें भी तो हस्ती में डाल दूँ / रवि सिन्हा

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थोड़ी वजाहतें[1] भी तो हस्ती[2] में डाल दूँ
इस शाम कुछ नहीं तो ये दुनिया सँभाल दूँ

बैठा हुआ हूँ ख़ल्वते-वाहिद[3] में बेजिहात[4]
यूँ ही ख़ला[5] में क्यूँ न कुछ तारे उछाल दूँ

सारी ज़मीन ढँक तो दी अपने वजूद से
सूना पड़ा हो आसमाँ तो इक हिलाल[6] दूँ

माना के ख़ाक में निहाँ[7] इमकान-ए-हयात[8]
मिट्टी में क्यूँ न बीज कुछ ख़्वाहिश के डाल दूँ

दौरे-जदीद[9] ख़ल्क़[10] है हर बात का जवाब
मैं हूँ कि हर जवाब को वापस सवाल दूँ

बुनियाद संगो-ख़िश्त[11] जो होंगे मकान के
तामीर[12] की कहो मैं क्या उनको मिसाल दूँ

आँखों में कुछ नज़र तो है मुँह में ज़ुबान भी
तेरे मुजस्सिमे[13] को आ हुस्नो-जमाल[14] दूँ

शब्दार्थ
  1. कारण, व्याख्याएँ (reasons, explanations)
  2. अस्तित्व (existence)
  3. ईश्वर का एकान्त (God’s loneliness)
  4. बिना दिशाओं के, निष्प्रयोजन (without directions or purpose)
  5. शून्य, अन्तरिक्ष (vacuum, space)
  6. नया चाँद (New Moon)
  7. छुपा हुआ (hidden)
  8. जीवन की सम्भावना (possibility of life)
  9. आधुनिक युग (modern times)
  10. अवाम, सृष्टि (People, Creation)
  11. पत्थर और ईंट (stone and brick)
  12. संरचना, बनावट (structure)
  13. मूर्ति (statue)
  14. रूप और सौन्दर्य (beauty and grandeur)