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दंगा-फ़साद / विजय चोरमारे / टीकम शेखावत

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दंगा-फ़साद और सँचारबन्दी के
कितने आदि हो गए हैं लोग यहाँ के?

कल, परसों, या कभी आगे चलकर
सारे धर्म बर्खास्त हो गए
जातियाँ दफ़न कर दी गईं
मनुष्य की पशु प्रवृत्ति गल गई
भूल गए लोग लड़ना-झगड़ना
कारण ही नहीं बचेगा तब दंगा-फ़साद के लिए ......?

कैसे बढ़ेगा अख़बारों का सर्क्युलेशन?
न्यूज़ चैनल किसका कवरेज़ देंगे?
लाल किले से भाईचारे का सन्देश किसे देंगे?

इनसान खो बैठेगा अपनी पहचान
भेद न होगा इनसान और जानवर में
इस ग्लोबल विलेज में
दंगे ही हैं
आदमी और जानवर के बीच की अलग पहचान

अनेक धर्म
अनेक जातियाँ
अनेक प्रान्त
अनेक भाषाएँ
अनेक नदियाँ
अनेक प्रश्न
सड़ते रहें

एक दंगा
कितनों का जीवन चंगा !

मूल मराठी से अनुवाद — टीकम शेखावत