भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए
लोक संगीत
कविता कोश विशेष क्यों है?
कविता कोश परिवार

दफ़्तर के बाद-2 / रमेश रंजक

Kavita Kosh से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

डूब गई स्याही में
रेशमी पहाड़ी
पूरी हो गई चलो
आज की दिहाड़ी

खुले-खुले अंग फ़ाइलों के
फीतों में कस गए
गूँज उठे छन्द टायरों के
और हम विहँस गए
गन्ध क़ैदख़ाने की
बाँध कर पिछाड़ी