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दफ़्तर के बाद-4 / रमेश रंजक

चलो कहीं चलें
अपनापन बदलें
ऐसी कुछ करती है तबियत
किसी बड़े लॉन में डुबो आएँ
दिन भर की बोरियत
चलो कहीं चलें

हाथों पर लगे रोशनाई के धब्बे
चाक के निशान
कन्धों पर धरे फिरे
हम अस्सी-नब्बे
धूप की थकान

चलो किसी होटल में धो आँ
सारी मनहूसियत
चलो कहीं चलें