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दर्पण / विजय कुमार विद्रोही

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मैं भी दे सकता हूँ तुमको कविता में अंगार यहाँ
सौदे में ला सकता था मैं गर्जन का अंबार यहाँ
लेकिन झोली में अपने मैं दर्पण भरकर लाया हूँ
लोभ मोह की चिता सजाकर पूर्ण समर्पण लाया हूँ

देखो इस दर्पण में तुमको क्या दिखलाई देता है
बल नयनों का खो बैठे हो या दिखलाई देता है
क्या जलता भारत दिखता है या दिखती रोती मथुरा
क्या कोई मधुबन दिखता है या दिखती है लाल धरा

क्या तुमको भूखे बचपन का रण दिखलाई देता है
वीर शिवा राणा का कोई प्रण दिखलाई देता है
भालों की फालों की कोई चमक दिखाई देती है
लहू पिपासा तलवारों की धनक दिखाई देती है

तेज़ाबों से जलता यौवन और कहीं मातम देखो
देखो माटी की क़ीमत में तुम लुटता तनमन देखो
कहीं दिखी क्या पीड़ा अपने लाल भगत की फाँसी की
सैनिक की माता की आँखें या घनघोर उदासी की

बिना टमाटर सारा जीवन लगता नीरस हुआ यहाँ
बिन गाड़ी के ना पहुँचोगे जाना हो जिस ओर जहाँ
कोई यहाँ पर झाड़ू मारे कोई कमल खिलाता है
कहीं कहीं हाथी फिरता है करतल शोर मचाता है

अपहरणों की काली छाया शायद तुमने देखी है
देख नहीं सकते हो क्या तुम या कोई अनदेखी है
कर्तव्यों का वध कर डाला अधिकारों के वंदन में
अब तक बदबू ढूँढ़ रहे हो नंदनवन के चंदन में

देख नहीं पाऐ तो भाई, अब की मुझको माफ़ करो
ले जाओ खैराती दर्पण नैतिकता से साफ़ करो
वरना अपने दूषित कुंठित दुष्कर्मों में शर्म करो
मेरा दर्पण वापस कर दो चुल्लू जल में डूब मरो