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दस दोहे (01-10) / चंद्रसिंह बिरकाली

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आंठू पोर अडीकतां वीतै दिन ज्यूं मास ।
दरसण दे अब, बादळी मूरधर नै मत तास ।।1।।

आठों पहर प्रतिक्षा करते हुए दिन भी महीनों की तरह व्यतीत होते
है । बादली, अब तो दर्शन दो ! मरूधर को और अधिक त्रास मत दो ।

आस लगांया मुरधरा देख रही दिन रात ।
भागी आ तुं, बादळी आयी रूत बरसात ।।2।।

मरूधरा तुम्हारी आशा लगाये दिन-रात देख रही है। बादली, तू
दौड़ी आ ! वर्षा ऋतु आ गई है ।

कोरां-कोरां धोरियां डूंगा-डूंगा डेर ।
आव रमां ए बादळी ले ले मुरधर ल्हैर ।।3।।

बादली, आओं ! मरूधर में लहरें ले ले कर, कोरे-कोरे टीलों
और गहरे-गहरे डैरों में रमण करें ।

ग्रीखम-रूत दाझी धरा कळप रही दिन रात ।
मेह मिलावण बादळी बरस बरस बरसात ।।4।।

ग्रीष्म ऋतु से दग्ध धरा दिन-रात कलप रही है । मेह से मिलन कराने वाली
बादली, बरसो और ख़ूब बरसों

नहीं नदी-नाला अठै नहिं सरवर सरसाय ।
एक आसरो बादळी मरू सूकी मत जाय ।।5।।

यहाँ न तो नद्दी-नाले है और न सरोवर ही सरसा रहे है । बादली एक तेरा
ही आश्रय है, अतः मरूधरा में बरसे बिना ही न चली जाना ।

खो मत जीवण, बावळी डूंगर-खोहां जाय ।
मिलण पुकारै मुरधरा रम-रम धोरां आयं ।।6।।

बादली, पर्वत गुफ़ाओं में जाकर मत खोओ । तुम से मिलने के लिये
मरूधरा पुकार रही है। यहाँ आकर टीलों में रमण करो ।

नांव सूण्या सुख उपजै जिवडै हुळस अपार ।
रग-रग नाचै कौड में दे दरसण जिणवार ।।7।।

तुम्हारा नाम सुनते ही सुख उपजता और प्राणों में अपार हुलास होता
है । जिस समय तू दर्शन देती है रग-रग तुम्हारे चाव में नाच उठती
है ।

आयी घणी उडिकंता मुरधर कौड करै।
पान फूल सै सूकिया कांई भैंट धरे ? ।।8।।

बहुत प्रतीक्षा के बाद तू आई है, इसलिए मरूधरा चाव कर रही है। पर फूल
पत्ते सब सूख गए है, वह तुम्हे क्या भेंट दें ?

आयी आज उडिकंता झडिया पान र फूल ।
सूकी डाळयां तिणकला मुरधर वाळ समूळ ।।9।।

प्रतीक्षा करते हुए आज तू आई है, पर फूल-पत्ते सब झड़ चुके है । मरूधार,
सुखी डालिंया और तिनके अपना सर्वस्व न्यौछावर कर दे ।

आतां देखै उंतवाली हिवडै़ हुयो हुळास।
सिर पर सूकी जावतां छूटी जीवण आस ।।10।।

तुम्हें द्रुतगति से आती देख ह्दय में हुलास हुआ, पर सिर पर से सूखी ही जाते समय जीवन की आशा छूट रही है ।