भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए
कविता कोश विशेष क्यों है?
कविता कोश परिवार
Roman

दस दोहे 11-20 / चंद्रसिंह बिरकाली

Kavita Kosh से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज


मन में डर नित माळियां बागां फूल्या जेम।
थांसूं हो निभाव जे जंगळ फूलां खेम।। 11।।

बगों में खिलने वाले पुष्पों को तो प्रतिदिन मालियों का डर लगा रहता है पर यदि तुम बन में खिलने वाले पुष्पों के प्रति सहृदयता रख सको तो उनके जीवन में अन्य कोई बाधक नही।

जिण दिन झड़ता देखिया पायो दुख अणमाप।
बळसी आपे बेलड़यां मतना सेको ताप।। 12।।

जिस दिन से बेलों ने अपने सामने फूलों को झड़ते देखा है उन्हें अपार दुःख हो रहा है। उस असहृ वेदना से वे स्वयं जलती जा रही है। अतः लूओं ! तुम वृथा क्यों उन्हें अपने प्रचंड ताप से जला रही हो।

लूआं लाग पिळीजिया आमां हाल बेहाल।
पींजू मुरधर पाकिया ले लाली, ज्यूं लाल।। 13।।

लूओं के उग्र ताप को आम न सह सके, वे पीले पड़ गये और उनका बुरा हाल हो गया। परन्तु करील फलों का लू कुछ ना बिगाड़ सकी, अपितु वे पक कर लालों की तरह लाल हो गये।

लुआं आय‘र रोस में बाळी जद बणराय।
बडै़ जनत सूं बीज सै राख्या धरा लुकाय ।। 14 ।।

लूओं ने क्रोध में आकर जब समस्त् वनस्पति को जला डाला तब पृथ्वी ने बीजों को यत्नपूर्वक छिपा कर बचा लिया, अन्यथा बीजों के जल जाने पर पुनः वनस्पति कैसे प्रस्फुटित होती !

देख तपंती ताव सूं मूरधर ब्रख रै भाण।
हियै हिमाचळ ऊझळ्यो बह चाल्यो वरफाण।। 15।।

वृष राशी के प्रचंड सूर्य के ताप से तपाई जाती हुई मरूधरा को देखकर हिमालय का शीतल हृदय भी द्रवित हो चला और वह बर्फ के रूप में पिघल-पिघल कर बहने लगा।

बाळपणै बैसाख में तातो इसड़ो ताव़।
पूरै जोबन जेठ में लूआं किसो उपाव़।। 16।।

बैसाख के महीने में शैशव काल ही में जब लूओं का इतना प्रचंड ताप है भला ज्येष्ठ मास में, इनके पूर्ण यौवनावस्था को प्राप्त होने पर, इनसे बचने का कौन सा उपाय होगा !

तेज घमकतो ताव़ड़ो चमकै जाणै साण।
ले ले रगड़क आंव़तां लूआं लैवे़ प्राण।। 17।।

तेज किलकिलाती धूप शान की तरह चमक रही है और उससे रगड़ लेती हुई ‘लूऐं’ इतनी तेज हो चली हैं कि वे प्राणों तक को लेने को तैयार है।

धरा गगन झळ ऊगलै लद लद लूआं आय
चप चप लागै चरड़का जीव़ छिपाळी खाय।। 18।।

मरूधरा अग्नि की लपटें उगल रही है। वह ही लपटें लूओं पर सवार होकर आ रही है और उसका स्पर्श अंगो को जला रहा है। उनके डर के मारे जीव सिमट कर छिपे रहते है।

तोवै ज्यूं धरती तपै ऊपर तपै अकास।
लूं लपटा सै दिस तपै जीव़ तपै इण तास।। 19।।

पृथ्वी तवे के समान तप रही है, ऊपर आकाश तप रहा है और लूओं की लपटों से सारी दिशाएं तप रही है। इन्हीं सब कारणों से जीव जला जा रहा है।

ज्यूं ज्यूं सूकै जीव़ जग त्यूं त्यूं लूआं तेज।
बाळै जाळे सोस़वै दूणो चढ़ै मगेज।। 20।।

जैसे-जैसे संसार के प्राणी सूखते जा रहे है उसी मात्रा में लूएं तेज होती जा रही है। वें सबको जला रही है, भस्म कर रही है और सुखा रही है। सबको भस्मसात् देखकर उनका घमंड और भी बढ़ता जा रहा है।