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दाल खौलती है चूल्हे में / धीरज श्रीवास्तव

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दाल खौलती है चूल्हे में,जले पतीली आग सखी।
फटे हृदय का हाल न पूछो,रही बैठकर ताग सखी।

चिन्तनीय है दशा बहुत ही
कौन- कौन सी कथा कहूँ !
कैसे भला रहे अब कोई
किससे मन की व्यथा कहूँ !

साजन भी परदेश गये हैं,मुझे छोड़कर भाग सखी।
दाल खौलती है चूल्हे में,जले पतीली आग सखी।

देख मुझे बस हँसे वेदना
नयनों में जल ही जल है !
यज्ञ सुखों का कर पाना अब
दण्डकवन में मुश्किल है !

मँहगाई की सोयी डायन,गयी आजकल जाग सखी।
दाल खौलती है चूल्हे में,जले पतीली आग सखी।

बदली- बदली हवा गाँव की
बदले सभी नजारे हैं !
सेठ बने हैं गिद्ध सभी अब
एक हमीं बंजारे हैं !

चील खेलती रंग यहाँ पर,कौवे गाते फाग सखी।
दाल खौलती है चूल्हे में,जले पतीली आग सभी।

यहाँ पहुँच से बिल्कुल बाहर
आलू का है दाम हुआ !
सूखे लहसुन अरमानों के
और प्याज बदनाम हुआ !

आसमान में रोज खोंटती,बस बथुए का साग सखी।
दाल खौलती है चूल्हे में,जले पतीली आग सखी।