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दिनकर को लेकर / प्रांजल धर

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एंडी, मूगा, टसर, हथकरघे का बाज़ार
तांबुल के वृक्ष, कसू से हरी-भरी ज़मीन
जल्दी का सूर्योदय
और निर्धन गृहस्थी की मार
असम की नम ज़मीन पर चलते हुए
अचानक दिनकर याद आ जाते हैं,
‘...धर्मराज कर्मठ मनुष्य का पथ संन्यास नहीं है...’
और मिसिंग परिवारों का दैनिक संघर्ष भी
अनायास जीवंत हो उठता है।

मन फिर आगे बढ़ता है
और फिर राष्ट्रकवि दिनकर पर रुकता है।
मणिपुर, मिजोरम, नगालैंड और दिनकर में
एक बड़ी मोटी समानता है,
‘राष्ट्रकवि’ का गौरव देकर हमने
जिस तरह अपने कर्तव्य की इति कर ली
उसी तरह पूर्वोत्तर को भी
अनुदान देने के बाद
भला पूछता कौन है?

ह्वांग-हो से सांग-पो तक
चीन को चीरते हुए
हमारा ब्रह्मपुत्र आगे बढ़ता जाता है
अभावों के कसीदे पढ़ता जाता है
और असफलताएँ
शहतूत के कीड़ों-सी
ज़िन्दगी पर चढ़ती जाती हैं।
पूरब में कहते हैं,
आम लोग भी,
‘पूब फाले बेलि ओलाय’
ठीक ही तो है, दिनकर या सूरज
पूरब में निकलता है।

केबुल लामजाओ, संगाई और लोकटक झील
दिनकर चले गए बहुत दूर,
...कई मील,
और लोकटक किनारे की मोइरंगवाली
पावन प्रेम-कहानी की तरह
विस्मृत हो गए

यह अलग बात है
कि खंबा और थोइबी<ref>मणिपुर में मोइरंग नामक स्थान की एक प्रचलित पुरानी प्रेम-कहानी। खंबा नायक है और थोइबी नायिका है।</ref>
आज भी पूजे जाते हैं
साहित्य में भी लोग
निर्धन बाल-श्रमिकों को देख
एक गीत गाते हैं,
‘माँ की छाती से चिपक-ठिठुर
जाड़े की रात बिताते हैं।’
लेकिन दिनकर बाँस की ज़मीन के
कोमल बिहुवान<ref>बिहुवान असम में गमछे को कहा जाता है,क्योंकि बिहू पर्व में इसका महत्त्व बहुत बढ़ जाता है।
</ref> हैं,
हिंदी के मान हैं...

दिमाग घूमकर अचानक
चकरघिन्नी हो जाता है
चिल्लाकर बेकार हो चुके हाथोंवाले
मछुवारों का चिल्लाता ‘सीन’ याद आ जाता है
और संबलपुरी भी कोई तसल्ली नहीं दे पाता!
यथार्थ, जिसे चेख़व ने बहुत भयंकर कहा था,
को सोचकर सवाल खड़े होते हैं
और दिनकर को लेकर हम वेगई <ref>तमिलनाडु की एक प्रसिद्ध नदी। यह भारत और श्रीलंका के बीचवाले समुद्र में गिरती है।</ref>के किनारे
खड़े-खड़े रोते हैं, खड़े-खड़े रोते हैं।

शब्दार्थ
<references/>