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दिन ज़िन्दगी के यों भी गुज़र जायँ तो अच्छा! / गुलाब खंडेलवाल


दिन ज़िन्दगी के यों भी गुज़र जायँ तो अच्छा
हम इस ख़ुशी के दौर में मर जायँ तो अच्छा

यों तो न रुक सकी कभी कूची तेरी, रँगसाज़!
फिर भी कभी ये हाथ ठहर जायँ तो अच्छा

मजमा उठा-उठा है, झुकी आ रही है शाम
मेले से हम अब लौटके घर जायँ तो अच्छा

चरणों में बिछी उनके पँखुरियाँ गुलाब की
कुछ आख़िरी घड़ी में सँवर जायँ तो अच्छा