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दिन तो आते हैं उम्र जाती है / रवि सिन्हा

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दिन तो आते हैं उम्र जाती है
रात क्यूँ रात भर सताती है

भीड़ है हाफ़िज़े[1] में यादों की
एक ही है जो गुनगुनाती है

ख़्वाब जो है वही तसव्वुर[2] में
इक हक़ीक़त सी बन के आती है

जी का जुग़राफ़िया[3] नहीं हमवार[4]
याँ नदी हादसे बहाती है

आप नक़्शे में राह खो बैठे
ज़िन्दगी रास्ते बनाती है

सू-ए-फ़र्दा[5] चलो मगर धीमे
साथ तहज़ीब भी तो आती है

दिन में तारे फ़ना नहीं होते
रौशनी बहुत कुछ छुपाती है

शब्दार्थ
  1. स्मृति (memory)
  2. कल्पना (imagination)
  3. भूगोल (geography)
  4. चौरस, सपाट, चपटा (flat)
  5. आने वाले कल की तरफ़ (towards tomorrow)