भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए
लोक संगीत
कविता कोश विशेष क्यों है?
कविता कोश परिवार

दिल्ली का भीड़-भड़क्का / प्रकाश मनु

Kavita Kosh से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

दिल्ली का यह भीड़-भड़क्का
देख रहे थे अपने कक्का,
होकर बिल्कुल हक्का-बक्का
बोले-तबीयत घबराती है,
अब घर जाएँगे...
हम घर जाएँगे!

भीड़ इधर है, भीड़ उधर है,
रस्ता जाने कहाँ, किधर है!
पागल-सी अफराती भीड़
बिना बात झल्लाती भीड़,
बिना बात की ऐसी हड़बड़,
सुबह-सुबह ही तबीयत गड़बड़।

बोले-बहुत देख ली
दिल्ली,
अब तो भाई, घर जाएँगे,
अब हम भाई, घर जाएँगे।

सर्र-सर्र ये मोटर कारें
दौड़ रहीं ज्यों चाँटे मारें,
चौराहे पर धुआँ-धुआँ-सा
अजी, मौत का एक कुआँ-सा!

दम घुटता है...
बोले कक्का-
भैया, कहाँ फँसे हम आकर,
अब घर जाएँगे...
हम घर जाएँगे!