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दिल्ली की बस / रमेश तैलंग

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दिल्ली की बस है ये
दिल्ली की बस ।

रुक-रुक-रुक कहो
मगर फिर भी न रुकती ।
चढ़ने से पहले
लड़नी पड़ती कुश्ती ।
तब जाकर अन्दर
घुस पाते हैं बस ।

मरज़ी की मालिक है
आती है ’लेट’ ।
पीछे का हो चाहे
आगे का ’गेट’ ।
भरा हुआ रहता है
ख़ूब ठसा-ठस ।

गिरो-पड़ो, लड़ो-मरो
पर इसको क्या ।
रूठे तो लगवाती
सबसे धक्का ।
और कभी ’ट्रैफ़िक’ में
जाती है फँस ।