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दिल किस की तेग़-ए-नाज़ से लज़्जत-चशीदा है / मीर 'तस्कीन' देहलवी

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दिल किस की तेग़-ए-नाज़ से लज़्जत-चशीदा है
हर जख़्म शौक़ से लब-ए-हसरत-गज़ीदा है

इस गर्म-ए-इजि़्तराब से दिल जल गया ख़ुदा
पहलू में मेरे दिल है के बर्क़-ए-तपीदा है

चूसा दहान-ए-ज़ख़्म ने उस को इस तरह
पैकान-ए-तीर-ए-यार ज़बान-ए-मकीदा है

नासेह जुनूँ की बख़्या-गरी की हवस नहीं
हर तार-ए-जैब अब तो गिरेबाँ-दुरीदा है

गु़ँचा की तरह ख़ाक रखें ज़र को बाँध कर
जूँ बोले कल यहाँ से तो जाना जरीदा है

कुछ आज ज़लज़ला सा ज़मीं को है गोर में
‘तस्कीन’-ए-बे-क़रार मगर आर्मीदा है