भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए
लोक संगीत
कविता कोश विशेष क्यों है?
कविता कोश परिवार

दिल हैं पोशीदा बहोत मिसमार हैं / सिया सचदेव

Kavita Kosh से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

दिल हैं पोशीदा बहोत मिसमार हैं
आजकल चेहरे ही बस बाज़ार हैं
 
खुशबुएँ भी इस धुंए ने छीन लीं
फ़ूल गुलशन में हैं पर लाचार हैं
 
हाँ मिलावट ही मिलावट हर तरफ
हर तरफ बस आदमी बेज़ार हैं
 
एक सच्चा आदमी अनशन पे है
अब यहां बदलाव के आसार हैं
 
हम गरीबों के लिए कुछ भी नहीं
ख़ुद की ख़ातिर अहलेज़र दिलदार हैं
 
एक व्यापारी ने मुझको ये कहा
आप का लिखना सिया बेकार हैं