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दिवर्या की रची कारी कोरस्या, बीर सावन रे / पँवारी

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पँवारी लोकगीत   ♦   रचनाकार: अज्ञात

दिवर्या की रची कारी कोरस्या, बीर सावन रे
भौजी की लाल गुलाल, रंग सावन रे
दिवर्या बताये अनी मायऽ सी
भौजी रे कोहे बताय रंग सावन रे
कोठी पऽ दिवल्या लेसन्ती वीर सावन रे
परखय हाय दुही-दुही हात, गुलाबी रंग सावन रे
लिख-लिख पतिया लेजन्ती बीर सावन रे
बाप मरे घर आव, गुलाबी रंग सावन रे
बाप मरे मरऽ जाए वीर सावन रे
मिट गयो चौरी को ख्याल गुलाबी रंग सावन रे
लिख-लिख पतिया भेजन्ती बीर सावन रे
माय मरऽ मर जाए गुलाबी रंग सावन रे
भाई मऽरोऽ घरऽ आव, गुलाबी रंग सावन रे
मिट गयो चेण्डु को ख्याल गुलाबी रंग सावन रे
लिख-लिख पतिया भेजन्ती बीर सावन रे
बहनी मऽरीऽ घरऽ आव, गुलाबी रंग सावन रे
बहिन मऽरीऽ मर जाये, वीर सावन रे
मिट गयो राखी को ख्याल गुलाबी रंग सावन रे
लिख-लिख पतिया भेजन्ती बीर सावन रे
बेटा मऽरोऽ घरऽ आव, गुलाबी रंग सावन रे
बेटा मऽरो मरऽ जाये बीर सावन रे
मिट गयो झूला को ख्याल गुलाबी रंग सावन रे
लिख-लिख पतिया भेजन्ती बीर सावन रे
रनिया मऽरोऽ घरऽ आव, गुलाबी रंग सावन रे
कागज पटक्यो चबूतरा, लिखनी रे साहेब हाथ। गुलाबी रंग सावन रे।
एक बन छोड्यो दुजा वन मऽ वीर सावन रे
तीजा बन आय गई गाँव गुलाबी रंग सावन रे।।
कण्डा बिन्ती डोकरी बीर सावन रे
घर की पूछयऽ कुशलता, गुलाबी रंग सावन रे
बाप हय बोण्डी वसन्ता, बीर सावन रे
माय हय रेहटा को ख्याल, गुलाबी रंग सावन रे।
पनिया भरन्ती परिहारन बीर सावन रे
घर की पूछयऽ कुशलता, गुलाबी रंग सावन रे।।
भाई हय चेण्डु खेलन्ता, बीर सावन रे
बहिन खऽ फुतरी को ख्याल, गुलाबी रंग सावन रे।।
गल्ली झाड़न्ती डोकरी, बीर सावन रे
घर की पुछय कुशलमात, गुलाबी रंग सावन रे।।
रनिया हय रोटी पोवन्ती, बीर सावन रे
बालक हय झूला का ख्याल, गुलाबी रंग सावन रे।।
बेटा हाय झूला-झूलन्ता, वीर सावन रे
रनिया हय रोटी को ख्याल, गुलाबी रंग सावन रे।।
असी छन्देल नऽ छन्दसी ख्याल, बीर सावन रे
लियो छन्द सी ओखऽ बुलाय, गुलाबी रंग सावन रे