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दिवलै री जोत जळी राखो / मानसिंह शेखावत 'मऊ'

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मीठा बोर-मतीरा चाखौ!!
भल छोड़ौ आतिशबाजी थे,
लिछमी हरख-उमावां पूजौ!
बात याद आ ई पण रैवै,
पावै नीं कोई दुख दूजौ!!
घर तो जगमग करणों ई है,
करणौं है जगमग जग आखौ!
दिवलै री जोत जळी राखो !!
बो दीन-दुखी दुबक्यो बैठो,
बीं नैं उजास में ल्याणू है!
थे अँधारै रै गैल पड़ो,
घर-घर में दियो जलाणू है!!
मत पिवौ ऐकला इमरत नैं,
थे निजर गरीबां पर नांखौ!
दिवलै री जोत जळी राखो!!
जोत जगा थे हेत - प्रेम री,
अपणापण रौ देनैं हेलो!
इण दिवलै रै पाण दिखावौ,
सै भूल्या - भटक्यां नैं गेलौ!!
जीं पातळ में बैठ्या जीमौ,
बीं में मत काडीजो झाखौ!
दिवलै री जोत जळी राखो!!