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दिवाली-दिवाली / रमेश तैलंग

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नमस्ते ! नमस्ते !
लो, फिर आ गई मैं,
पटाखे चलाती,
दिये जगमगाती,
दिवाली ! दिवाली !

पता है, पता है,
मुझे सब पता है ।
छुपा कर कहाँ किसने,
क्या-क्या रखा है ।
लड़ी छिटपिटी की,
अनारों के डिब्बे ।
बम, वाण,
वो फुलझड़ी फूल वाली ।

चलाना, चलाना जी,
सब कुछ चलाना ।
ये त्योहार ही है ख़ुशी का,
मनाना ।
मगर आग के पास,
ज़्यादा न जाना ।
ज़रा दूसरों को भी,
देखो, बचाना ।
कहीं ऐसा न हो कि,
छोटी-सी ग़लती से,
दुनिया उजाले की,
हो जाए काली ।