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दीन-हीन मढ़ी ऐलै, सतगुरु मोर हे / छोटेलाल दास

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दीन-हीन मढ़ी ऐलै, सतगुरु मोर हे।
भरम के तम गेलै, होलै ज्ञान-भोर हे॥टेक॥
टूटलै किवाड़ सखी, कठिन कठोर हे।
सतगुरुँ कैलखिन, उर में इँजोर हे॥1॥
पाप-दोष भागि गेलै, काम-क्रोध चोर हे।
कमल बिगसि गेलै, समझ अथोर हे॥2॥
मन में बिराग भेलै, गेलै दुख घोर हे।
गुरु-प्रेम रँगि गेलाँ, भेलाँ सराबोर हे॥3॥
गुरु के प्रणाम करौं, दोउ कर जोरि हे।
‘लाल दास’ गुण गाबै, मगन विभोर हे॥4॥