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दीप के तले छिद्र / रामेश्वरलाल खंडेलवाल 'तरुण'

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जग में कितने वैज्ञानिक, कितने नीतिकार,
वक्ता, पंडित, ज्ञानी-ध्यानी, इतिहासकार,
दार्शनिक हजारों, और सुधारक घर-घर में,
ये राजनीति के पण्डे-मीलों की कतार!

हिमगिरि का मस्तक फोड़ दिया अभियानों से,
दी छील समुद्रों की छाती जलयानों से,
दी बाँध बलप में ज्योति सूर्य, शशि, तारों की-
रे, धन्य मनुज की बुद्धि, बुद्धि का चमत्कार!

रॉकेट से हमने यह अनन्त नभ चीर लिया,
बिजली के पंखे में है बन्द समीर किया,
कर लिया काल को कैद, घड़ी के डायल में,
रेडिया बना-वाणी पर पाया स्वाधिकार!

पैनी आँखों से भेद लिये अणु के रहस्य,
रच टेलिविजन बस में कर डाले दूर-दृश्य,
लो, चन्द्र-विजय के लिए उड़ चले धरती से-
अब देश-काल के स्वामी हैं हम शक्ति-सार!

हम सब साधन-सम्पन्न, किन्तु मन चिर दरिद्र!
रे, कहाँ रहेगा तेल, दीप के तले छिद्र!
हो रही सभ्यता आज घड़ा शिव-मन्दिर का,
रे, बूँद-बूँद कर, वहा जा रहा रस अपार!