भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए

दुआ जीने की ... / सुरेश स्वप्निल

Kavita Kosh से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

अश्क अपनी पे उतर आएँ तो क्या कीजिएगा
रूह के ज़ख़्म उभर आएँ तो क्या कीजिएगा

कोई सदमा[1] हो कोई ग़म हो तो रो भी लीजे
चश्म[2] हर बात पे भर आएँ तो क्या कीजिएगा

लाख गिर्दाब[3] करें ग़र्क़[4] हमें दरिया[5] में
डूब कर हम जो उबर आएँ तो क्या कीजिएगा

हम शबे-वस्ल[6] गुज़ारा करें तन्हा-तन्हा[7]
और वो वक़्ते-सह् र[8] आएँ तो क्या कीजिएगा

बदगुमानी[9] में कई दोस्त ज़ेह् न[10] से निकले
अब वही दिल के शह् र आएँ तो क्या कीजिएगा

आपका हक़ है शबे-वस्ल के हर लम्हे पर
ख़्वाब दिन में ही नज़र आएँ तो क्या कीजिएगा

रोज़ देते हैं हमें आप दुआ जीने की
रोज़ इज़राइल[11] इधर आएँ तो क्या कीजिएगा ?!

शब्दार्थ
  1. आघात
  2. नयन
  3. भँवर
  4. जलमग्न
  5. नदी
  6. मिलन की रात
  7. अकेले
  8. उषा के समय
  9. असन्तोष
  10. मस्तिष्क
  11. मॄत्युदूत