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दुख को मैं तो साध रहा हूँ / श्यामनन्दन किशोर

दुख को मैं तो साध रहा हूँ!
आँसू से अपने यौवन को
हलचल धीमे बाँध रहा हूँ!

टूट चुके हैं सपने सारे।
छूट चुके हैं अपने प्यारे।
पर दुख-दर्द भुला लेने को
ढोता उनकी याद रहा हूँ!

जगने कब समझा-पहिचाना
पतझर में कोकिल का गाना?
एकाकी सूनेपन से ही
कर जीवन आबाद रहा हूँ!

मरु में सागर लहराने को,
प्रतिध्वनि से जी बहलाने को,
जान-बूझकर पाषाणी से
मैं करता फरियाद रहा हूँ!

(1949)