दुख को मैं तो साध रहा हूँ!
आँसू से अपने यौवन को
हलचल धीमे बाँध रहा हूँ!
टूट चुके हैं सपने सारे।
छूट चुके हैं अपने प्यारे।
पर दुख-दर्द भुला लेने को
ढोता उनकी याद रहा हूँ!
जगने कब समझा-पहिचाना
पतझर में कोकिल का गाना?
एकाकी सूनेपन से ही
कर जीवन आबाद रहा हूँ!
मरु में सागर लहराने को,
प्रतिध्वनि से जी बहलाने को,
जान-बूझकर पाषाणी से
मैं करता फरियाद रहा हूँ!
(1949)