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दुख में सुख की मधुर कल्पना / विष्णु सक्सेना

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दुःख में सुख की मधुर कल्पना कैसा सुघड़ निदान है।
प्यासों को दो बूँद ओस की मिली, मिला भगवान है।।

जब माँ से चंदा की ज़िद की,
कहा, चाँदनी तेरी है।
सुख का दिवस बहुत छोटा,
पर दुःख की रात घनेरी है।
ऐसी ज़िद न कर रे लाडले, तू कैसा नादान है।
प्यासे को दो बूँद ओस की मिलीं, मिला भगवान है।

संबंधों के अनुबंधों में,
अंधियारा ही अंधियारा।
जाने किसकी नज़र लगी,
जो टूटा दरपन बेचारा?
सगुण पात्र में ऊधौ कैसा ये निर्गुण पकवान है?
प्यासे को दो बूँद ओस की मिलीं, मिला भगवान है।

नयन उनींदे विवरण देंगे
मेरी बीती रातों का।
समय किसी का सगा नहीं है,
मन आदी आघातों का।
अभिशापों का बोझ मुझी पर, कब पाया वरदान है?
प्यासे को दो बूँद ओस की मिलीं, मिला भगवान है।

एक नई परिभाषा लिख दे,
युग की स्वर्णिम स्याही से।
निश्छल प्रेम करें जन-जन से,
जैसे मंज़िल राही से।
यहीं हुए अवतार, यहीं पूजा जाता पाषाण है।
प्यासे को दो बूँद ओस की मिलीं, मिला भगवान है।