दुनिया का सबसे धनी बालक / मनीषा जैन

पेड़ के पत्तों पर ठहरी हुई हो उम्मीद जैसे
सपनों के बिखरने की आवाज़ भी नहीं होती
धूप उतर आती है आँगन में
सरकती है फिर दीवार से नीचे
अनंत काल का प्रेेम बिला जाता है कहीं
गुम हो रहा है धरती से प्रेम
बिना प्रेम के धरती!
ओ हो! कैसी कल्पना
उस प्रेम को बचाने के
सारे यत्न किए गए
ढूंढ़ा गया प्रेम को
घरों में , मंदिरों में
मस्जिदों में, गिरिजाघरों में
प्रदर्शनकारियों की मोमबत्ती के नीचे
अंधेरी सुनसान सड़कों पर
अंधेरे बंद कमरो में
कृश्णपक्ष की काली रात में
रेत के चक्रवात के भीतर
कहीं नहीं मिला प्रेम
ढूंढते रहे सब प्रेेम
फिर कहीं जा कर मिला वह
एक भिखारिन के वक्ष से लिपटे
सूखा स्तन चबाते
एक बालक के मुख पर
प्रेम का सामा्रज्य था
प्रेम से भरा हुआ वह बालक
माँ के स्तन से टकराती उसकी गर्म साँसें
उसकी हथेलियों की गर्म छुअन में था प्रेम
दुनिया का सबसे धनी बालक था वह।

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