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दूरि ही ते देखति दसा मैँ वा वियोगिनि की / पद्माकर

दूरि ही ते देखति दसा मैँ वा वियोगिनि की ,
आई दौरि भाजि ह्यां न लाज मढि आवैगी ।
कहै पदमाकर सुनौ हो घनस्याम वाहि ,
चेतत कहूँ जो एक आह कढि आवैगी ।
सर सरितान को न सूखत लगैगी बेर ,
एती कछू जुलसिन ज्वाला बढि आवैगी ।
बाकी बिरहागि की कहौँ मैं कहा बात ,
मेरे गातहिं छुवौ तो तुम्हें ताप चढि आवैगी ।


पद्माकर का यह दुर्लभ छन्द श्री राजुल महरोत्रा के संग्रह से उपलब्ध हुआ है।