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दूरे - बड़ी दूर / रामेश्वरलाल खंडेलवाल 'तरुण'

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दूर-बड़ी दूर-
तुमको मैं ले जाऊँ, दूर-बड़ी दूर!

तुम पर कर स्वप्नों-भरी पलकों की छाँव,
ले जाऊँ हरियाले गीतों के गाँव-
बहती जिस ठौर नदी, रस की भरपूर!
दूर-बड़ी दूर!

नयनों के बाहर मत झाँको हर बार,
लठिया ले घूम रहा तम का सरदार,

कलियों को चुनता जो आँखों से घूर!
दूर-बड़ी दूर!
माटी की ठौर जहाँ होता सिन्दूर!
दूर-बड़ी दूर!
तुमको मैं ले जाऊँ, दूर-बड़ी दूर!