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दूर...दूर / रामेश्वरलाल खंडेलवाल 'तरुण'

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दूर-दूर-दूर,
नीले महासमुद्रों के बीच,
स्पप्न-लीन किसी अनजान द्वीप के तट पर
निँबोई चाँदनी वाली
आधी रात में,
खरखराती समुद्री हवाओं पर
मछुआरों की जब कोई स्वर-लहरी उठती सी-
आ रही हो,

किसी पुरानी मध्ययुगीन गढ़ी की-
काई-वाली दीवाल से,
चाँद-तारों की छाया में,
चाँदी के वर्क-लगी लहरें टकरा कर-
करती हैं-छप्-छप्; छप्-छप्...
थप...
यों, जैसे-
मेरी अदर्धचेतनावस्था में,
किसी सुभर-गौर जंघा पर-
बड़े आश्वासन से टिके मेरे निँदियारे-निविड़ शीष पर
कोई कोमल थापें
खन्खन् गौर-स्निग्ध पाणि-पल्लव की
पड़ती हों थप्-थप्...थप्-थप्!