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दूर चली गई अयोध्या / प्रमोद कुमार

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घर-घर में थे राम
हर आँगन राम की जन्म-भूमि,

मेरे गाँव से अयोध्या जाना कहीं और जाना न था
लोग जो कुछ रोज लेते
वही सत्तू-नमक और काम भर नाम
पोटली में बाँध निकल पड़ते
और विदेह हो जाते,
अयोध्या से लौटी
भरी पोटलियों को
औरतें बार-बार खोलतीं
अपने से निकालती बहुत कुछ
और
उन्हें पसार देतीं पूरे गाँव और टोलां में,

अयोध्या भी पूरा साथ निभाती
वह कभी छोड़ कर जाती नहीं
औरतों में वह मंगल-गीत गाती हुई
कभी भी सुन ली जाती,
हर फ़सल की कटाई में
बालियाँ सहेजती
बोवाई में
पहला बीज उसी का होता,

एक दिन एक अयोध्या मेरे गाँव में घुस आई
वह गीत गाती हुई नहीं
चीखती-चिल्लाती हुई आई
उसने गाँव के
ठंडे जल को ग्रहण नहीं किया
चूल्हे-चौकी पर नहीं गई
रसोई घर के धुएँ से
गला बैठने का डर उसे सता रहा था
वह बच्चों के लिए कुछ भी नहीं लाई थी
न कोई मिठाई, न एक खिलौना !
उसने एक बड़ा पिटारा खोला
लेकिन, उसमें सुहागिनों के लिए एक चुटकी सिन्दूर भी न था
वह ऐसी अयोध्या थी
जो कुछ हीं देर में
घरों के राम को बेकार कह गई
वह बता गई कि अयोध्या वहाँ नहीं है
जहाँ हम जानते रहे युगों से

वह जाते-जाते अयोध्या पहुँचने का
एक अपरिचित और चमकीला पदचिन्ह छोड़ गई
जिस पर चलने की आदत
मेरे गाँव वालों में बिल्कुल नहीं,

अपने राम को बचाने
दूसरों की राह नहीं गए मेरे गाँव के लोग ।
मेरे गाँव से
बहुत दूर चली गई अपरिचित अयोध्या ।