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देखऽ कि हीलि रहल नीम केर ठुहरी / धीरेन्द्र

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देखऽ कि हीलि रहल नीम केर ठुहरी
नहुँ-नहुँ कि डेग दिअय जेना नवकनियाँ
कते असार आ कत्ते पसार अछि
हटा लेलक हाट मने वसन्ता ई बनियाँ
कोइली अछि कुहकि रहल गबइत की होरी
वनक भाल देखह मीत पलाशक रोरी
स्वच्छ गगन मगन धरा उमगय जलाशय
बूझत की मीत हमर मोनक क्यो आशय
तीत-तीत मोन कि बिखरल अछि प्रीति लड़ी
सुखा गेल अंग-अंग भीजल ई गीत-लड़ी
लगइत बसात ई जेना अंगोर हो
शीतल ई जल मने जेना इन्होर हो
कनइतसन ओनाः लागय हमरा ई दुनियाँ