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देखो मुझे कि जलवाए-रब्बे क़दीर हूँ / राजेंद्र नाथ 'रहबर'

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देखो मुझे कि जल्वा-ए-रब्बे क़दीर हूँ
मुझ से मिलो कि शख्स बड़ा बे-नज़ीर हूँ

हिन्दू भी चाहते हैं मुसिलमान भी मुझे
शायद मैं कोई संत हूँ कोई फ़क़ीर हूँ

उर्दू है मेरा नाम अज़ीज़े-जहां हूँ मैं
मक़बूले-ख़ासे-आम हूँ रौशन ज़मीर हूँ

मुझ को नहीं है कोई ज़रो-माल की कमी
दरगाह वो अज़ीम है जिस का फ़क़ीर हूँ

आइद न मुझ पे कीजिये इल्ज़ामे-मुफ़लिसी
मैं बादशाहे वक़्त हूँ दिल का अमीर हूँ

खेंची गई है साथ मिरे इक बड़ी लकीर
'रहबर' इसी लिए तो मैं छोटी लकीर हूँ।