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देह से दूर / पृथ्वी: एक प्रेम-कविता / वीरेंद्र गोयल
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फड़कती रहती पीठ रातभर
करवटें बदलता, रहा सोचता
किसका मिलेगा प्रेम
खींच नहीं पाया
कोई भी क्षण
स्मृति की नदी से
अचानक मिलीं तुम
गलियारे मंे
हाँ, तुम ही तो थीं
स्नेहिल, प्यारभरी
भरी-पूरी-छलकती-छलकती
हिरनी जैसे नयनों-सी चकित दृष्टि
फिर कुछ और समय
यादों के तहखाने में सहेजा
पहचाना था तुमने ही
मेरे अंदर का कवि
कविता पढ़ते-पढ़ते
बरसने लगा अव्यक्त आनंद
पीते रहे जिसे चुपचाप
आलाप छूने लगा आकाश
सभी सीमाओं,
सभी बंधनों को तोड़-मरोड़
अपनी जगह बनाता
गिरता रहा अंदर ही अंदर
रोशनी झक सफेद
भोर के उजियारे-सी शीतल
अदृश्य हो गये व्यक्तित्व
मुस्कराहट और आँसू
साथ-साथ प्रेम के
अदल-बदलकर जीये
अंतहीन समय में
वो कुछ क्षण।