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दोराहे पर लड़कियाँ / संध्या गुप्ता

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दोराहे पर खड़ी लड़कियाँ
गिन -गिन कर क़दम रखती हैं
कभी आगे-पीछे
कभी पीछे-आगे
कभी ये पुल से गुज़रती हैं
कभी नदी में उतरने की हिमाक़त करती हैं

ये अत्यन्त फुर्तीली और चौकन्नी होती हैं
किन्तु इन्हें दृष्टि-दोष रहता है
इन्हें अक्सर दूर और पास की चीज़ें नहीं दिखाई पड़तीं

ये विस्थापन के बीच
स्थापन से गुज़रती हैं
जीवन के स्वाद में कहीं ज़्यादा नमक
कहीं ज़्यादा मिर्च
...कहीं दोनो से खाली

दोराहे पर खड़ी लड़कियाँ गणितज्ञ होती हैं
लेकिन कोई सवाल हल नहीं कर पातीं!