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दोसर खण्‍ड / भाग 2 / बैजू मिश्र 'देहाती'

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कोमल पग नहि पाबए क्लेश,
मन ममता छल भेल विशेष।
क्यो कर आरति क्यो गर माल,
केओ लगाबए चन्दन भाल।
चरण पूजि क्यो होए नेहाल,
सभ पुर बासी छला बेहाल।
सभ देखए टक-टकी लगाए,
छबि उपमा नहि कतहु देखाए।
भवनक उपर चढ़ि पुरनारि,
देखल छवि बहुबेर निहारिं
क्यो कह हे सखि एहन स्वरूप,
देखल नयन ने कतहु अनूप।
क्यो कह हे सखि सिय सुकुमारि,
वरण करथु तारक असुरारि।
दुहुक जोड़ि मुह कहलने जाए,
देव पितर सभ होथु सहाए।
दोसर कह सखि लघुनहि बात,
धनु प्रचंड ई कोमल गात।
तेसर कह सखि सुनु दए कान,
छण बिच हरल सुबाहुक प्राण।
तनिका कोमल कहब असंग,
दृढ़ करू मन करता धनु भंग।
क्यो कह नृप व्रत कठिन कठोर,
सुखतजि दुख केर धयल पछोर।
क्यो कह छोड़थु यज्ञ नरेश,
आकुल जन मन हरथु कलेश।
देथु सियाकेर रघुपति हाथ,
हैेत सकल पुरवासि सनाथ।
देखि नगर अएला श्रीराम,
यज्ञ स्थल जहँ बनल ललाम।
बनल यज्ञ थल गोल अकार,
चहुदिश आसन विविध प्रकार।
स्वर्ण जटित मणिजटित सोहाए,
रजत जटित छवि कहलने जाए।
सभक मध्य छल धनुष अजेय,
बलबंतक रखने सब श्रेय।
नगर घूमि अएला श्रीराम,
लखन सहित जहँ गृह विश्राम।
चरण छूवि लक्ष्मण सहित गुरू समीपमे जाए।
नगरक शोभा यज्ञथल सभ किछु कहत बुझाए।
प्राते उठत दोसर दिवस गेला जनक फुलवारि।
रामचन्द्र लक्ष्मण सहित गुरू आज्ञा सिरधारि।
तखनहि आबि गेली वैदेहि,
संग छलनि बहु सखी सन्नेह।
एक सखी देखल किछु दूर,
छवि सुन्दर दूटा भरि पूर।
रोकिने सकल मनक उत्साह,
दौगि पड़ल जनु होए बताह।
जाए समीम गेलि ठकुआए,
छवि लखि तन-मन गेल हेराए।
शब्द बिना ठमकल छल वैन,
पलक खसाएब बिसरल नैन।
लोक बजै छल सभटा ठीक,
त्रिभुवनमे छबि दुर्लभ थीक।
जिज्ञासा बस द्रुत गतिजाए,
दोसर गेली सेहो ठकुआए।
तेसर, चारिम जे क्यो गेलि,
दशा प्राप्त ओहने सभ भेलि।
एकसर सिय मन उठल बिचार,
टोना अछि ई कोन प्रकार।
उत्सुकता बस जनक दुलारि,
गेली, सखी जहँ छली निहारि।
देखल तहँ हरण भव भीड़,
धयने अनुपम मनुज शरीर।
कोटि काम छवि तुच्छ लखाए,
भल ने सखी सभ किये भरमाए।
रघुपति नयन सिया केर नैन,
भेल चारि बतिआएल बैन।
प्रीति पुरातन बात प्रसंग,
नारायण लक्ष्मी केर संग।
पुनि हकारि सब संग सहेलि,
सिय चलली मन प्रमुदित भेलि।
गिरिजा पूजल मंदिर आबि,
चरण धयल निज करसौं दाबि
स्तुति कयलनि सिय विविध प्रकार
बिसरू जुनि रहू बनल उदार।
मुसुकैली गिरिजा तहि काल,
इच्छित वर दए कयल नेहाल।
आबि महल सिय पुलकित गात,
कहल मायकें सुघटित बात।
माय सुनयना देल आशीष,
पुरबथु सकल मनोरथ ईश।
तहिक्षण शंखक भेल निनाद,
मख आरम्भक छल संवाद।
आवाहन सुनि यज्ञकेर, अएला नृपति समाज।
सिया विवाह प्रसंगमे, शक्ति प्रदर्शन काज।
गुरूक संग अएला ततए, रघुकुल कमल दिनेश।
लखन सहित शोभित भेला जनु मृग मध्य मृगेश।
जनकक प्रण जे कर धनु भंग,
सियाक गेंठ जोड़ब तहि संग।
आगत नृप गण कएल प्रयास,
डिगल ने कनिओ सुनल उपहासं
धनु पर जतेक लगाबथि जोर,
ततेक पताल मर्दन कएदेल।
दसमुख सेहो लगौलनि दाओं,
अयश उठा घुरि गेला गाआें।