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दोसर खण्‍ड / भाग 4 / बैजू मिश्र 'देहाती'

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सहस-सहस नर गज अरू बाजि,
रथ सहस्र चलला सभ साजि।
उतरि पार नद-नदी सुनाम,
अएला सभ मिथिलेशक धाम।
पूछू जुनि स्वागत सत्कार,
छल पुर वासिक कतेक प्रकार।
सौहाद्रिक छल तेहन बसात,
सभ बूझथि हमरे बरियाल।
गीत-नाद के चलल प्रवाह,
जनकक आंगन अमित अथाह।
कतहु स्वयंवर केर छल गीत,
कतहु नचारी सुखद प्रतीत।
कतहु ग्वालिरी गाबथि नारि,
कतहु देव देवीक गोहारिं
सरस मधुर स्वर तेहन बुझाए,
सुनथि बराती कान लगाए।
तहिक्षण जनक कयल प्रस्ताव,
दशरथ नृप केर देखि लगाव।
पुत्र रत्न छथि चारि अहाँकें,
हमरो सुता चारि सुकुमारि।
हो विवाह मंगल मय सबहक,
प्रपुदित हो जगतक नर-नारि।
सुनि प्रस्ताव जनक के दशरथ,
स्वीकृति देल नहि कयल विलम्ब।
जाए सुनौलनि रानि सुनयना,
भेली सहाय जगतकेर अम्ब।
द्विगुणित स्वरमे होमए लागल,
मधुमय गीत वाद्य झंकार।
नभमे ठोकि प्रतिध्वनि सुनबए,
दशरथ जनकक मिलन हकार।
सिया भेली रघुवरक संगिनी,
धएल उर्मिला लखनक संग।
भरथक वामा भेली मण्डवी,
श्रुतीकीर्ति रिपु दमनक अंग।
भेला सुशोभित वर कन्या सभ,
रत्न जटित मड़बा पर आबिं
छवि निहारि छवि स्वयं लजायल,
बैसि गेलि निर्जन थल पाबि।
अंतरिक्षमे झगड़ा उपजल,
चन्द्र वायु नभते छल होड़।
हम देखब, हम देखब छविकें,
खुब लगौने पक्षक जोर।
पहिने अएला शशि छवि देखए,
रथक अश्व केर रोकि लगाम।
तन्मय भेला तेहन दर्शनमे,
बिसरि गेला अस्ताचल धाम।
मेघ आबि आननकें झांपल,
गेला इन्दु मनमे अकुलाए।
वायु मोछ पर हाथ पिजौलक,
ककर शक्तिजे देत हटाए।
सतानन्द मुनि वेद पढ़ाबथि,
छला कर्म-काण्डक मर्मज्ञ।
गुरू वशिष्ठ दशरथ जनकादिक,
देखल नयन तृप्त कए यज्ञं
अमित दास दासीकें रहितहुँ,
अपने परसथि सिंदुर तेल।
रानि सुनयना भाव विहला,
लखि सुहागिनक मेला मेल।
अति आनन्दक बीच भेल छल,
चारू भाइकेर सुखद विवाह।
पुर वासी सभ नयन जुड़ौलनि,
मन परि पूरित अधिक उछाह।
कतेक दिवस रखलनि वरियाती,
मिथिलाक स्वागत जग विख्यात।
शुभ दिन देखि विदाई कयलनि,
अघटित घटल ओही क्षण बात।
सियाक सबारी छलनि पालकी,
स्वर्ण जटित कत लागल रत्न।
दू कहार नहि उठा सकल तऽ,
चारि आठ बहुकयलि यत्न।
तदपिने उठलनि छोट जानकी,
अजगुत बात सभक मनमे।
ऋषि मुनी जनकादिक दशरथ,
मिथिला वासिक जन-जनमे।
सभ क्यो सभसँ पूछथि कारण,
क्यो नहि कहलनि एकर निदान।
यद्दपि कयल दूहू समधी मिलि,
याचककें बहुदान प्रदान।
गुरू आदेश पाबि श्री रघुवर,
गेला पालकी केर समीप।
दए एकांत दूर भए गेला,
गुरूजन परिजन सहित महीपं
पूछल राम सियासँ कारण,
सुनू, कहल सिय, कान लगाए।
याचक सकल अयाची भेला,
देल धरित्रीकें बिसराए।
जन्म देलनि पुनि पालन कयलनि,
पुरल हमर सभ मन केर आश।
किन्तु हमर धात्रीकें अखनहुँ,
नहि किछु दए रखनछि निराश।
की चाही से कहू जानकी,
करब पूर्णहम ओ तत्काल।
अति विनम्र भए बजला रघुपति,
मेटा देब चिंता केर जाल।
नहि नहिसे नहि मात्र एकटा,
कहल जानकी, दी वरदान।
होमए वास स्वर्गमे तनिकर,
मिथिलामे जे कर अवसान।
एवमस्तु कहितहि रघुवर केर,
उठा लेलक दुइए टा कहाए।
सहस-सहस नर नारि उचारल,
राम जानकिक जयजय कार।