भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए

दोस्त बन कर भी नहीं साथ निभाने वाला / फ़राज़

Kavita Kosh से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

दोस्त बन कर भी नहीं साथ निभानेवाला
वही अन्दाज़ है ज़ालिम [1]का ज़मानेवाला

अब उसे लोग समझते हैं गिरफ़्तार मेरा
सख़्त नादिम[2] है मुझे दाम[3] में लानेवाला

सुबह-दम छोड़ गया निक़हते-गुल[4] की सूरत
रात को ग़ुंचा-ए-दिल[5] में सिमट आने वाला

क्या कहें कितने मरासिम[6] थे हमारे उससे
वो जो इक शख़्स है मुँह फेर के जानेवाला

तेरे होते हुए आ जाती थी सारी दुनिया
आज तन्हा हूँ तो कोई नहीं आनेवाला

मुंतज़िर[7] किसका हूँ टूटी हुई दहलीज़ पे मैं
कौन आयेगा यहाँ कौन है आनेवाला

मैंने देखा है बहारों[8] में चमन को जलते
है कोई ख़्वाब की ताबीर[9] बतानेवाला

क्या ख़बर थी जो मेरी जान में घुला है इतना
है वही मुझ को सर-ए-दार[10] भी लाने वाला

तुम तक़ल्लुफ़[11] को भी इख़लास[12] समझते हो "फ़राज़"
दोस्त होता नहीं हर हाथ मिलानेवाला

शब्दार्थ
  1. अत्याचारी
  2. लज्जित
  3. जाल, बंधन
  4. गुलाब की ख़ुश्बू की तरह
  5. दिल की कली
  6. मेल-जोल
  7. प्रतीक्षारत
  8. वसंत ऋतुओं
  9. स्वप्नफल
  10. सूली तक
  11. औपचारिकता
  12. प्रेम