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दोहा / भाग 2 / हरिप्रसाद द्विवेदी

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कूकरु उदरु खलाय कैं, घर घर चाँटत चून।
रहो रहत सद खून सों, नित नाहर नाखून।।11।।

पैरि पार असि धार कै, नाखि युद्ध नर मीर।
भेदि भानु मण्डलहिं अब, चल्यौ कहाँ रणधीर।।12।।

औसरू आवत प्रान पै, खेलि जाय गहि टेक।
लाखनु बीच सराहियै, प्रकृति बीर सो एक।।13।।

सीस हथेरी पर धरें, ठौकत भुज मजबूत।
छिति छात्रनी गर्भ तें, जनमतु सूर सपूत।।14।।

लाबै बाजी प्रान की, चढ़ि कृपान की धार।
सोई क्षत्रिय धर्म की, मेंड़ रखावन हार।।15।।

लोहित लथ-पथ देखि कैं, खण्ड-खण्ड तन त्रान।
निकसत हुलसत युद्ध में, बड़ भागिनु के प्रान।।13।।

बसत सदा ता भूमि पै, तीरथ लाख-करोर।
लरत-मरत जहँ बाँकुरे, बिरुझि बीर बर जोर।।17।।

नमो-नमो कुरु खेत तुय, महिमा अकथ अनूप।
कण-कण तेरो लेखिमतु, सहस तीर्थ प्रतिरूप।।18।।

एक ओर स्वाधीनता, सीसु दूसरी ओर।
जो दो में भावै तुम्हैं, भरि मो लेहु-अँकोर।।19।।

किम्मत हिम्मत कौ नहीं, नहिं बल-बीरज-तोल।
आँक्यो गयौ न आनु लौं, बीर मौलि कौ मोल।।20।।