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दोहा / भाग 3 / चन्द्रभान सिंह ‘रज’

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चतुर, गुनी, गायक सरस, श्रेष्ठ साहसी मित्र।
बार मुखी ‘रज’ रसिक कवि, हौवे सभा विचित्र।।21।।

हीरा गिरि मणि सर्प बिच, ‘रज’ सरसिज बिचपंक।
बिधि भूलत ही कंट कहु, दीन गुलाबन डंक।।22।।

दुःख सुख राखौ मनहि बिच, कहौ न किहु सन जाय।
सुनि कै हँसिहैं ‘रज’ सबै, करहि न कोउ सहाय।।23।।

बारमुखी अरु कूप ‘रज’, बिनु गुन नैक न देत।
दै रस कुलटा बावरी, अजस वृथा सिर लेत।।24।।

जड़ चेतन ‘रज’ सग कै, तजि मद मोह प्रपंच।
त्यागि दम्भ पाखण्ड सब, तपहु प्रेम की अंच।।25।।

सीतल मन्द समीर ‘रज’, कालिन्दी के तीर।
सखियन संग श्यामा सहित, झूलत हलधर वीर।।26।।

कालिन्दी कछरान के, कदलि करील सुपुंज।
कदँब, केतकी केवरे, कृष्ण केलि रज कुंज।।27।।

श्याम कंठ बिच राधिका, दिये प्रेम गल बाहिं।
चढ़ी कनक की बेल जिमि, ‘रज’ तमाल तरु माँहि।।28।।

एक दिन राधे प्रेम बस, लीह्ने गोद गोविन्द।
सो छवि लखि उर राखि ‘रज’, उगत निसा बिच चन्द।।29।।

प्रेम रूप ‘रज’ लखत ही, दृग इक टक रहि जात।
लुकि छिपि कै फिर फिर लखत, लखि लखि नहीं अघात।।30।।