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दोहा / भाग 4 / किशोरचन्द्र कपूर ‘किशोर’

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नभ तक जाती तान थी, सुरगण चढ़े बिमान।
सुनते थे सुर माधुरी, मौन लगाये कान।।31।।

ताता थेई ताल पर, नाचत सब मिलि साथ।
झूम झूम कर घूम कर, सखियन सँग ब्रजनाथ।।32।।

ताधिन ताधिन मचा है, रचा रास रस-रंग।
ताथेइ ताथेइ होत है, नृत्यकरत सब संग।।33।।

गौर प्रभा से लली की, गौर हुआ सब ठाम।
श्वेत चाँदनी को परस, गौर हुए घनश्याम।।34।।

श्वेत हुए पिक काग सब, श्वेत हुआ बन बाग।
श्वेतरंग यमुना भई, श्वेत कालिया नाग।।35।।

राधा के सौन्दर्य से, श्वेत हुआ संसार।
मानो पारा का धवल, उमड़ा पारावार।।36।।

या आया है क्षीरनिधि, करन श्वेत संसार।
श्री हरि के श्रम हरण हित, परसन चरण उदार।।37।।

उत उद्धव रथ आ गयो, वृन्दाबन के पास।
खग मृग दौड़े रथ निरख, हरिदर्शन की आस।।38।।

कृष्ण कृष्ण रटते हुए, दौड़े रथ की ओर।
आतुर विह्वल जीव सब, शुक पिक बायस मोर।।39।।

गाय बच्छ दौड़े तुरत, बाँय बाँय कर शोर।
मृग केहरि समझे यही, आये नन्दकिशोर।।40।।