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दोहा / भाग 4 / हरिप्रसाद द्विवेदी

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वह शकुन्तला लाड़िलों, कब तें माँगत रीय।
खंग-खिलौना खेलिबे, अबहिं लाय दै मोय।।31।।

सेनापति सत सहसहूँ, सकैं जाहि नहिं जीति।
ताहि स्वबस करि लेति है, सहज प्रीति की रीति।।32।।

लोटि लोटि जापै भए, धूरि-धूसरित आज।
वत्स तुम्हारे हाथ है, ता धरती की लाज।।33।।

सुदिनु ज्योतिषी ते कहा, सोधवावत रण-हेत।
चढ़ि आये वै दुर्ग पै, तुव इत रे अचेत।।34।।

फूँकत पीं पीं बासुरी, रह्यो न यामें स्वादु।
है त्रिलोक में भरि गयो, संगम संख सुनादु।।35।।

कलपि कलप भूखन मरति, तुव सन्तति अभिराम।
कहा जानि धार्यो जननि, अन्नपूरणा नाम।।36।।

जौ न घालि घननाद कों, यमपुर आजु पठाउँ।
हौं रामानुज मुख कबौं, जियत न औध दिखाउँ।।37।।

जौ लगि मूरि न लाउँ मैं, मारुति तौलगि तात।
करि-सुधि मो सिसु केलि की, मुख न खोलियौ प्रात।।38।।

प्रण कीनों बहु बीर जग, टैकहु गही अनेक।
पै भीषम ब्रत आजु लौं, है भीषम ब्रत एक।।39।।

मूँछ न तौ लौं ऐंठिहौं, हौं प्रताप भुज-हीन।
करि पायौ जौ लौं न मैं, गढ़ चित्तौर स्वाधीन।।40।।