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दोहा / भाग 7 / हरिप्रसाद द्विवेदी

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धनि गोरा यह साहसी, धँसी साँग हिय-पार।
बाँधि आँत पुनि तेग लै, भयो तुरंग असवार।।61।।

अलादीन-दल दारिबे, बद्दलु बीरु बलन्द।
मेरे मत मेवाड़ में, प्रगट्यो पारथ नन्द।।62।।

वह चित्तौर की पùिनी किमि पेहौ सुलतान।
कब सिंहिनि अधरानु कौ, कियौ स्वान मधु-पान।।63।।

क्यों न धारियै सीस पै, वह जौहर की राख।
भव-तनु-भूषन भसम तें, जो पुनीत गुन लाख।।64।।

जगत जाहि खोजत फिरै, सो स्वतन्त्रता आप।
बिकल तोहिं हेरह अजौं, राणा निठुर प्रताप।।65।।

प्राण-प्रिया कौ सीसु लै, परम प्रेम उपहार।
चल्यो हुलसि रणमंत्र ह्वै, चूड़ावत सरदारु।।66।।

रखी तुहीं सरजा शिवा, दलित हिन्द की लाज।
निरवलंब हिन्दून को, तूँही भयो जहाज।।67।।

छत्रसाल नृप नामु तुवं, मंगल मोद निधान।
सुमिरि जाहि अजहूँ बनिक, खोलत प्रात दुकान।।68।।

असि-ब्रत धारयो धर्म पै, उमगि उधारयो हिन्द।
किए सिक्ख तें सिंह सब, धनि-धलि गुरुगोविन्द।।69।।

माथ रहौ वा न रहौ, तजैं न सत्य अकाल।
कहत कहत ही चुनि गए, धनि गुरुगोविंद लाल।।70।।