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द्युपितर सुनो / दयानन्द 'बटोही'

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आज अग्नि जलाकर
मैंने स्वाद-भरा भोजन किया
जनता सकुचाती
नितराती गाती है
सच-सच बतलाओ द्युपितर
कब तक अँधेरे में रखोगे?
मैंने जान लिया है तुम्हारी नीति को
तुम्हारी भाषा को
आस्था से नहीं
घबराहट से जनता तुम्हें पूजती रही
अब
तुम्हारी यन्त्रणा— मेरी नीति को
यातना-भरे भाव को
समझकर
यातनाओं के जंगल में
लहूलुहान हो दौड़ रहे हैं वो

अभी-अभी तो अग्नि फेंका हूँ
जनता ले गयी है
देखो! उस गाँव को
धुआँ उठ रहा है
देखो! द्युपितर!! देखो!!!

सकुचाओ नहीं!
आह!
मेरे कलेजे को कुतर-कुतर
खाता है गिद्ध तुम्हारा
तुम स्वयं खाओ
आओ द्युपितर आओ!
मैं ख़ुश हूँ तुम्हारी यन्त्रणा से
मैं नहीं डरता हूँ यातना से
देखो मेरी ओर देखो!
आँखें मत नवाओ
आओ मेरे ह्रदय-पिंड के लहू पियो
तुम यातना हो
यातना में जियो
द्युपितर तुम कल के
आज भी हो
मैं प्रमथ्यु हर क्षण
यातना में ख़ुश रहूँगा
मंज़िल पाने के लिए।