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द्रोणाचार्य / हरकिशन सन्तोषी

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द्रोणाचार्य
क्या तुम इस देश के मनु को जानते हो?
द्रोणाचार्य
क्या तुम 'तथाकथित वीर अर्जुन' को जानते हो?
द्रोणाचार्य
क्या तुम 'परमवीर एकलव्य' को जानते हो?
यदि नहीं
तो आओ मैं तुम्हें इनका परिचय कराऊँ!
तुम्हारे अन्तर्मन की व्यथा का नाम—
है मनु
तुम्हारे अन्दर के छल-कपट की शिक्षा का नाम—
है अर्जुन
तुम्हारे कलुषित अन्तर्मन की पहचान का नाम—
है एकलव्य

द्रोणाचार्य
तुम तो सिद्ध गुरु थे
और विद्याओं के धनी थे
फिर क्यों तुमने
एकलव्य का माँगा था अँगूठा?
संकीर्णता के इतिहास के पन्नों में
लिखी गयी है तुम्हारी गुरुदीक्षा
दलितों के जो काम न आयी
यह कैसी थी ब्राह्मण तुम्हारी शिक्षा?

इस देश में जब भगवानों का
बँटवारा हो सकता है
तो क्यों—
खेत-खलिहानों का
उद्योग का, दुकान का
आँगन और मकान का
बँटवारा नहीं हो सकता?

अघोषित आरक्षण की सीढ़ियों से
जो चढ़े हैं आसमान पर
पहले तो उन्हें ज़मीन पर उतारो
और बँटवारा करो—
घर के सारे सामान का
फिर—
बाँटो आरक्षण की दुकान से

जब भी—
मेहनतकशों के पसीने की बूँद
अँगड़ाइयाँ लेगी
या जब-जब शान्ति करवटें लेगी
तब-तब क्रान्ति जन्म लेगी।

कब तक चलेगा
यह ज़ुल्म और सितम का सैलाब?
एक भाई भूखा सोता है
दूसरा खाना फेंकता है
एक नभ को छूता है
तो दूजा ज़मीन पर रेंगता है।
उच्च सम्भ्रान्त जातियाँ
भला क्यों समझ बैठी हैं अपने को
इस राष्ट्र की मालिक
क्यों नहीं छोड़ना चाहतीं—
अपना स्वामित्व
क्यों नहीं देना चाहतीं—
अधिकार सभी को
जिससे कि बचपन, जवानी और बुढ़ापा—
फागुनी रंगों में बसा लें अपना मन
सौहार्द्र-भाईचारे के इन्द्रधनुषी रंगों में
दलितों और पिछड़ों की
छातियों की पसलियों को बनाकर सीढ़ियाँ
उन्हीं के श्रम से खड़ी की गयी हैं बल्लियाँ
उन्हीं के पसीने से बाँधी गयी हैं रस्सियाँ
उन्हीं की ग़ुलामी से लगाई गयी हैं तख्तियाँ
जिससे कि—
मंज़िल तक पहुँचने से पहले ही
वे गिर जाएँ—
षड्यन्त्र की खाई में।
मेरे अँधेरों को
न तुम बदनाम करो
तुम्हारी ही चाँदनी ने जलाया है घर मेरा
जब भी—
हमें कुछ देने की बारी आयी—
तुमने योग्यता का सर्प फेंका
हमें डसने के लिए
फिर फेंके भाले आन्दोलनों के
तोड़-फोड़ के— आत्मदाह के
ताकि छाती का पी सको
ख़ून जी भरकर
हम-जैसे दलितों, पिछड़ों का, निर्धनों का

यह देखकर
मैं सोच में पड़ जाता हूँ कि
मित्र तुम कैसे शाकाहारी हो
जो तड़पते मानव का लहू चूसे जा रहे हो
सारी सरकारी
नौकरियों को हड़प जाने की नीयत से
सड़कों और खेतों में
जी भरकर उगाये जा रहे हो
... ... ...
मित्र तुम कैसे अहिंसावादी हो?
मित्र तुम कैसे शाकाहारी हो—
अपने ही भाइयों के भविष्य को
काट-काट कर
सुविधाओं की थाली में परोसकर
क़िस्तों में खाए जा रहे हो

पहले तो तुम्हीं ने काट दिये हाथ-पाँव हमारे
फिर तुम्हीं कहते हो कि—
'दौड़ में आगे आओ'

हमें जितना पीछे धकेला है
तुम उतना आगे आ जाने दो हमें
तब चलाना योग्यता के तीर
तब हमारी छाती से टकरा-टकराकर
तुम्हारे तीर वापिस चले जाएँगे
तुम्हारे ही श्वान-मुख में घुस जाएँगे
एकलव्य के तीरों की तरह

योग्यता के प्रश्न-चिह्न लगाने वाले!
अगर तुम्हीं योग्य थे
तो क्यों तुमने पाकिस्तान बनवाया?
क्यों तुमने
मातृभूमि के टुकड़े पर चीन को क़ाबिज़ करवाया?
क्यों तुमने
एक आँख के बदले दूसरी आँख का ऑपरेशन कर दिया?
क्यों तुमने
ऑपरेशन के समय मरीज़ के पेट में कैंची छोड़ दी?
क्यों तुमने
राष्ट्र-युद्ध के समय जमाख़ोरी की
क्यों तुमने
अपने देश की गुप्त सूचनाएँ विदेशों को बेंची
यदि ऐसा है तुम्हारा योग्यता का मापदंड
तो
हमें पिछड़ा ही रहने दो
हमें दलित ही रहने दो
हमें निर्धन ही रहने दो!