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द्रोपदी स्वयंवर / गढ़वाली लोक-गाथा

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   ♦   रचनाकार: अज्ञात

घूमदा घूमदा तब, गैन पाँचाल देश,
दु्रपद राजा की छै, तख एक नौनी,
राजौं की नौनी छै, देखणी दरसनी,
रूप की छलार[1] छै, ज्वानी उलार[2]
राजा दु्रपद न, राज्यों भेजीन परवाना
अर्जुन का पास गैन, तब ब्यास जी।
सुणा सुणा पंडऊँ, पांचाल देश मा
छ द्रोपती स्वयंवर।
बामण का भेष मा, छया पाँच पांडव।
पौंछी गैन द्रुपद का राज मा!
वै पाँचाल देश मा, आयाँ छया राजा,
राजा कर्ण छयो, जरासंध शीशपाल।
वै दु्रपद गढ़ मा छयो, लोखर[3] को खंभा,
तै खंभा का ऐंच, धरीं छई एक माछी
नीस बिटे, एक तेल की चासण[4]
राजा द्रुपद तब, यना बोदो बैन-
जो बालो, बेधलो तैं माछी की आँखी
वे कुंवर तैं द्यूलो मैं, दुरपता को डोला[5]
जु छाति का बालुन, कीवाड़ खोललो,
ओ माल[6] लिजालो, दुरपता को डोला।

जु थामलो सौ मण को, गोला जोंगो[7] मा,
वे कू बिवौण मैन, राजकिंवली अपणी।
तैं तेल की चासण, जो बवोती खेललो,
वे राजा द्यलो मैं, दु्रपता लाडली।
देस-देस का रजा उठीन, शग्ति अजमौण,
कैन मछी की आँखी, बेधी नी सकी।
तब दु्रपद राजान, क्षेत्री हँकारीन,
क्षेत्री हँकर चढ़े, बीर अर्जुन।
भेदी दिने वैन, माछी की आँखी।
तब राणी दुरपती, जैमाला अगास फेंकदे,
जैमाला रींगीक ऐ गए, अर्जुन का गला।

शब्दार्थ
  1. किरण
  2. लहर
  3. लोहा
  4. कढ़ाही
  5. डोली
  6. योद्धा
  7. मूँछों