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द्वादश प्रकरण / श्लोक 1-8 / मृदुल कीर्ति

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जनक उवाचः
देह वाचिक मानसिक, कर्मों को कर स्वच्छंद हूँ,
चैतन्य आत्मानंद स्थित, पूर्ण परमानंद हूँ.-------१

शब्दादि इन्द्रियों के प्रति, अब प्रीति भाव अभाव है
अब विक्षेपों का न आत्मा पर भी कोई प्रभाव है,----२

मैं आत्म रूप हूँ, अतः इन नियमों के न वयवहार हैं.-----३
 
ग्राह्य -त्याज्य वियोग निःसृत , दूर हर्ष विषाद से,
अब हूँ यथावत आत्म स्थित, ब्रह्म ज्ञान प्रसाद से -----४
 
आश्रम , अनाश्रम, ध्यान वर्जन, आदि से उन्मुक्त हूँ,
इनसे परात्पर आत्म स्थित , आत्मा उन्मुक्त हूँ.-----५

त्याग और संकल्प मन के, मूल में अज्ञान हैं ,
न मन मेरा अब कर्म कर्ता और न उपराम है.------६

ब्रह्म चिंतन भी है बंधन, उससे भी उन्मुक्त हूँ,
आत्मा में ही हूँ प्रतिष्ठित, आत्मा से संयुक्त हूँ.------७

यदि आत्मवत ही स्वभाव स्वतः, वह तो कृत - कृत धन्य है,
ज्ञानी हैं वे भी, स्वयम पायें, या कि साधन जन्य है.------८